दैव-असुर-सम्पदयोग
पन्द्रहवे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने घोषणा की, कि भौतिक संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूपी हथियार से काटना दैवी प्रकृति का प्रतीक है । दिव्य प्रकृति का अर्थ है ईश्वर के प्रति सम्पूर्ण शरणागति । इसका तात्पर्य यह है कि जो लोग उनकी शरण नहीं लेते हैं वे भौतिकवादी या आसुरिक प्रकृति के हैं । अब, अध्याय सोलहव में, श्रीकृष्ण दैवी और आसुरिक प्रकृतियों का अधिक विस्तार से वर्णन करते हैं । इस अध्याय में चौबीस श्लोक हैं, जो कि सभी श्रीकृष्ण के द्वारा बोले गए हैं ।
आरम्भ में, श्रीकृष्ण दैवी प्रकृति के गुणों को सूचीबद्ध करते हैं (१-३) तत्पश्चात् आसुरिक या भौतिकवादी प्रकृति के लोगों के गुण को दर्शाते हैं (४) । दैवी प्रकृति मुक्ति की ओर ले जाती है जब कि आसुरिक प्रकृति बन्धन में परिणत होती है (५) । जगत में दो प्रकार के लोग हैं: दैव और असुर (६) ।
श्रीकृष्ण आसुरिक प्रकृति के गुण और आचरण (७-१८) को दर्शाते हैं । ऐसे आसुरिक, ईर्ष्यालु व क्रूर व्यक्तियों को नरक में डाल दिया जाता है (१९) । नरक के तीन द्वार हैं, काम, क्रोध और लोभ । जो इन तीन दोषों से मुक्त है, वह परम पुरुषार्थ के लिए प्रयत्न करता है और उस परम पद को प्राप्त भी करता है (२१-२२) । इसके बाद श्रीकृष्ण शास्त्र की महत्ता को दर्शाते हैं । जो लोग शास्त्र में श्रद्धा नहीं रखते हैं, वे दुःखी होते हैं । इस प्रकार, अन्तिम श्लोक में वे अनुशंसा करते हैं कि व्यक्ति को शास्त्र को समझना और उसका पालन करना चाहिए (२३-२४) ।
सभी श्लोक
- श्लोक 1-3श्री भगवान ने कहा: निर्भयता, हृदय की शुद्धता, ज्ञान की साधना में दृढ़ता, दान, बाह्य इन्द्रियों का संयम, यज्ञ, वेदाध्ययन, तप, सरलता, अहिंसा, सत्यता, क्रोध का अभाव, वैराग्य, मन की शान्ति, परनिन्दा से मुक्ति, समस्त प्राणियों के प्रति करुणा, लोभ का अभाव, हृदय की मृदुता, लज्जा, स्थिरता, तेज, सहनशीलता, धैर्य, स्वच्छता, वैरभाव से मुक्ति और अति-अभिमान का अभाव, हे भरतवंशी,[ये छब्बीस गुण] दैवी सम्पदा में जन्म लेने वाले में उत्पन्न होते हैं।
- श्लोक 4हे अर्जुन! दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, अशिष्टता और अज्ञान, [ये सब] आसुरी सम्पदा में जन्म लेने वाले में [उत्पन्न होते हैं]।
- श्लोक 5यह निश्चित किया गया है कि दैवी सम्पदा मुक्ति की ओर ले जाती है, जबकि आसुरी सम्पदा बन्धन का कारण बनती है। हे पाण्डुपुत्र! शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा में जन्मे हो।
- श्लोक 6हे पार्थ! इस जगत् में जन्म लेने वाले प्राणी दो प्रकार के हैं, दैवी और आसुरी। दैवी स्वभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन किया जा चुका है; अब मुझसे आसुरी स्वभाव के विषय में सुनो।
- श्लोक 7आसुरी स्वभाव वाले लोग यह नहीं जानते कि क्या करना उचित है और क्या नहीं करना चाहिए। इसलिए उनमें न शुद्धता होती है, न सदाचार और न सत्यता।
- श्लोक 8वे कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, इसका कोई आधार नहीं है, इसका कोई ईश्वर नहीं है, यह [परस्पर संयोग से] निरन्तर उत्पन्न होता रहता है और, इतना ही नहीं, केवल कामना से ही उत्पन्न हुआ है।
- श्लोक 9इस मत को धारण करने वाले ऐसे वैरी लोग, जो आत्मबोध से रहित, अल्पविवेकी और क्रूर कर्म करने वाले हैं, केवल जगत् के विनाश के लिए जन्म लेते हैं।
- श्लोक 10कभी न तृप्त होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर और दम्भ, गर्व तथा अहंकार से युक्त होकर, ये अशुद्ध व्रत वाले [लोग] मोहवश मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके कर्म में प्रवृत्त होते हैं।
- श्लोक 11मृत्यु तक बनी रहने वाली अपरिमित चिन्ताओं के वश में होकर वे [इस धारणा में] दृढ़ रहते हैं कि इन्द्रिय-सुखों का भोग ही परम लक्ष्य है।
- श्लोक 12सैकड़ों [झूठी] आशाओं के बन्धनों से बँधे हुए और काम तथा क्रोध में पूर्णतः मग्न होकर वे इन्द्रिय-सुख प्राप्त करने के लिए अन्यायपूर्ण साधनों से धन संचय का प्रयत्न करते हैं।
- श्लोक 13[आसुरी स्वभाव वाले लोग इस प्रकार सोचते हैं]: “आज मैंने इतना प्राप्त कर लिया है और अब मैं इस मनोरथ को भी पूरा करूँगा। यह [धन] मेरा है और यह दूसरा धन भी मेरा हो जाएगा।”
- श्लोक 14“मैंने उस शत्रु को मार दिया है और दूसरों को भी मार दूँगा। मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही भोक्ता हूँ, मैं सिद्ध हूँ, शक्तिशाली हूँ और सुखी हूँ।”
- श्लोक 15अज्ञान से मोहित होकर इस प्रकार [वे सोचते हैं]: “मैं धनवान और कुलीन हूँ। मेरे समान और कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और हर्षित होऊँगा।”
- श्लोक 16अनेक मनोरथों से भ्रमित, मोह के जाल में फँसे और इन्द्रिय-सुखों के भोग में आसक्त होकर वे घोर नरक में गिरते हैं।
- श्लोक 17स्वयं को पूजनीय समझने वाले, अहंकारी, और धन, मान तथा गर्व से उन्मत्त होकर वे केवल नाममात्र के लिए, दिखावे हेतु, किसी विहित विधि का पालन किए बिना यज्ञ करते हैं।
- श्लोक 18केवल अहंकार, बल, उद्दण्डता, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, [ये आसुरी लोग] जो [साधुजनों के गुणों के भी] द्वेषी हैं, अपने तथा दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं।
- श्लोक 19मैं उन दुष्ट, क्रूर और अशुभ नराधमों को जन्म-मृत्यु के चक्र में [घूमते रहने के लिए] निरन्तर केवल आसुरी योनियों में फेंकता हूँ।
- श्लोक 20हे कुन्तीपुत्र! आसुरी योनियों में बार-बार जन्म प्राप्त करके ये मूर्ख निश्चय ही मुझे प्राप्त नहीं करते, [बल्कि] और भी अधम जन्मों में गिरते जाते हैं।
- श्लोक 21काम, क्रोध और लोभ, यह आत्मा का विनाश करने वाला नरक का त्रिविध द्वार है। इसलिए इन तीनों का त्याग करना चाहिए।
- श्लोक 22हे कुन्तीपुत्र! अन्धकार के इन तीन द्वारों [के प्रभाव] से मुक्त व्यक्ति अपने कल्याण के लिए आचरण करता है और फिर परम गति को प्राप्त करता है।
- श्लोक 23जो शास्त्र-विधि का त्याग करके भौतिक कामना के आवेग में कार्य करता है, वह न सिद्धि, न सन्तोष और न ही परम गति प्राप्त करता है।
- श्लोक 24इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका निर्णय करने में शास्त्र ही तुम्हारे लिए [उपलब्ध] प्रमाण है। इस जगत् में तुम्हें शास्त्र-विधि में वर्णित कर्म को जानकर [ही] कार्य करना चाहिए।