भ. गी. 16.1-3

श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥

अनुवाद

श्री भगवान ने कहा: निर्भयता, हृदय की शुद्धता, ज्ञान की साधना में दृढ़ता, दान, बाह्य इन्द्रियों का संयम, यज्ञ, वेदाध्ययन, तप, सरलता, अहिंसा, सत्यता, क्रोध का अभाव, वैराग्य, मन की शान्ति, परनिन्दा से मुक्ति, समस्त प्राणियों के प्रति करुणा, लोभ का अभाव, हृदय की मृदुता, लज्जा, स्थिरता, तेज, सहनशीलता, धैर्य, स्वच्छता, वैरभाव से मुक्ति और अति-अभिमान का अभाव, हे भरतवंशी,[ये छब्बीस गुण] दैवी सम्पदा में जन्म लेने वाले में उत्पन्न होते हैं।

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