भ. गी. 6.22
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
अनुवाद
उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर मनुष्य किसी भी अन्य लाभ को उससे अधिक नहीं मानता है और उसमें स्थित होकर वह भीषण दुःख में भी विचलित नहीं होता है।
उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर मनुष्य किसी भी अन्य लाभ को उससे अधिक नहीं मानता है और उसमें स्थित होकर वह भीषण दुःख में भी विचलित नहीं होता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक स्पष्ट कहता है कि इस लाभ के बाद अन्य किसी लाभ की इच्छा नहीं रहती, और करमती बाई का दृष्टांत साधना के कष्टों को सहन कर निष्ठापूर्वक आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.२२ के अनुसार, इस परम/अतीन्द्रिय सुख को प्राप्त करने के बाद साधक अन्य किसी लाभ को उससे अधिक नहीं मानता और 'गुरुणापि दुःखेन' (भारी से भारी दुःख मिलने पर भी) विचलित नहीं होता। वक्ता करमती बाई का दृष्टांत देते हैं, जिन्होंने वृंदावन आते समय घरवालों से छिपने के लिए मरे ऊँट की दुर्गंध सही और माना कि संसार के नरक से छूटने के लिए भक्ति-मार्ग के सामयिक कष्ट सहना कहीं बेहतर है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक में दुःख-संयोग के वियोग को योग कहा गया है, और आध्यात्मिक मार्ग में तुरंत फल की अपेक्षा किए बिना धैर्यपूर्वक लगे रहने का निर्देश है।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.२३ में भगवान योग की विलक्षण परिभाषा देते हैं—"दुःख के संयोग का वियोग ही योग है"। इसके अभ्यास के लिए दो मुख्य बातें बतलाई गई हैं: (१) स निश्चयेन—शास्त्र-श्रवण द्वारा संशयों को दूर कर अटूट निश्चय बनाना, और (२) अनिर्विण्णचेतसा—आधुनिक समाज की जल्दबाज़ी से बचकर बिना निराश हुए धैर्य (उत्साह, निश्चय, धैर्य) के साथ साधन में लगे रहना।
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