इसके पश्चात् अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य में अपने चाचा-ताऊओं* को, दादाओं को, आचार्यों को, मामाओं को, भाईयों एवं चचेरे भाईयों को, पुत्रों एवं भतीजों को, पौत्रों एवं चचेरे पौत्रों को, मित्रों को, ससुरों तथा सुहृदों को भी वहां उपस्थित देखा ।
टिप्पणियाँ
* चूँकि कुरुक्षेत्र के युद्ध से बहुत पहले ही अर्जुन के पिता का देहांत हो चुका था, इसलिए यहाँ बहुवचन पितॄन्, अर्थात् “पिताओं”, से आशय पिता के भाइयों से है, जिन्हें भारतीय पारिवारिक संबंधों में जन्मदाता पिता के लगभग समकक्ष माना जाता है। श्लोक 1.33–34 में पितॄन् के अनुवाद पर भी यही मानदंड लागू होता है।
इन तीन पङ्क्तियों में से अन्तिम तथा निम्नलिखित दो पङ्क्तियों में से पहली पङ्क्ति श्लोक संख्या २७ बनाती है ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन के रथ को भीष्म और द्रोणाचार्य के ठीक सामने स्थापित करके "इन एकत्रित कौरवों को देखो" कहने का क्या सूक्ष्म और गहरा आध्यात्मिक उद्देश्य था?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि भगवान का उद्देश्य अर्जुन में क्रोध या प्रतिशोध की भावना भड़काना नहीं था, बल्कि अर्जुन के अंतर्मन में छिपी आसक्ति और अज्ञान को प्रकट करके उसका स्थायी समाधान देना था।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान ने रथ को जान-बूझकर भीष्म और द्रोण के सामने खड़ा किया और कौरवों को देखने के लिए कहा ताकि अर्जुन के भीतर स्थित पारिवारिक और गुरु संबंधी सुप्त आसक्ति तथा संस्कार जागृत हो सकें। यही मोह और विषाद भगवद्गीता के महान उपदेश के प्रकटन का आधार बना।
कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में स्वजनों को देखकर अर्जुन के मन में उत्पन्न हुई 'कृपा' और उसके 'विषाद' का वास्तविक दार्शनिक स्वरूप क्या है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन का हृदय जिस कृपा से भरा, वह वास्तव में ममत्व और आसक्ति ही थी। भौतिक जगत में हमारी पहचान संबंधों से जुड़ी होती है; जब अर्जुन ने उन सभी संबंधों के एक साथ विनाश की संभावना देखी, तो उसे अपने ही अस्तित्व का लोप महसूस हुआ, जो भयंकर विषाद का कारण बना।
विकल्प ख (गलत): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन की कृपा निष्काम या आसक्ति-रहित नहीं थी, बल्कि वह 'ममत्व' (यह मेरा है) पर आधारित सांसारिक आसक्ति ही थी। जब तक ममत्व रहता है, तब तक वास्तविक अहिंसा या पूर्ण आध्यात्मिक दया संभव नहीं होती।