भ. गी. 7.13
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥
अनुवाद
प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न इन भावों से मोहित होकर, यह सम्पूर्ण जगत् इनसे परे और अव्यय मुझे नहीं जान पाता है।
प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न इन भावों से मोहित होकर, यह सम्पूर्ण जगत् इनसे परे और अव्यय मुझे नहीं जान पाता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि निर्जीव वस्तुओं में ज्ञान की पात्रता नहीं होती और संसार का भ्रम सोपाधिक बतलाया गया है, न कि निरुपाधिक।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार जड़ जगत में स्वयं जानने की योग्यता नहीं होती, अतः 'जगत' से तात्पर्य संसार के जीवों से है। यह मोह प्रकृति के तीन गुणों के अज्ञान रूपी उपाधि के कारण उत्पन्न 'सोपाधिक भ्रम' है, जो स्फटिक के पास रखी लाल वस्तु की भाँति अज्ञान रूपी उपाधि के हटते ही मिट जाता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार मन, बुद्धि और अहंकार में ही माया बैठी हुई है, अतः अपने बल से इसे जीतना वैसा ही है जैसे सरसों में भूत होना। जब साधक भगवान की शरण ग्रहण करता है, तो मायापति का आदेश पाकर माया तुरंत अपना प्रभाव हटा लेती है, ठीक वैसे ही जैसे मालिक के आते ही कुत्ता पूँछ हिलाते हुए नीचे बैठ जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि माया आंतरिक व त्रिगुणात्मक शक्ति है जिसे केवल भौतिक बल या धन से नहीं जीता जा सकता, बल्कि भगवद्-शरणागति ही इसका एकमात्र उपाय है।
✓ आपकी प्रोफ़ाइल में सहेजा गया। अपनी प्रगति और बैज देखें
अपनी प्रगति सहेजने और बैज पाने के लिए साइन इन करें। Sign In
ये पहले पूछे गए प्रश्न शायद आपके प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं:
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।