भ. गी. 6.39
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥
अनुवाद
हे कृष्ण! मेरे इस संशय का पूर्ण रूप से निवारण करना आपके लिए उचित है, क्योंकि आपके अतिरिक्त इसका पूर्ण निवारण करने में कोई भी सक्षम नहीं है।
हे कृष्ण! मेरे इस संशय का पूर्ण रूप से निवारण करना आपके लिए उचित है, क्योंकि आपके अतिरिक्त इसका पूर्ण निवारण करने में कोई भी सक्षम नहीं है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.३६ में भगवान कहते हैं कि अनियंत्रित मन वाले के लिए योग दुष्प्राप है, किंतु उपायतः (अभ्यास-वैराग्य आदि उपायों से) वश्यात्मा साधक इसे प्राप्त कर सकता है । व्याख्यान में वक्ता कार और स्टीयरिंग का उदाहरण देते हैं कि गाड़ी रोक देना (पूर्ण निरोध) व्यावहारिक नहीं है; बल्कि सड़क पर चलते हुए स्टीयरिंग द्वारा कार को सही लेन में नियंत्रित रखना ही 'मन को वश में रखना' है। इसके अतिरिक्त, साधना की सबसे गहराई में बैठी जड़—'भोगता भाव' को उखाड़कर 'मैं भगवान का नित्य दास हूँ' की अहंता का परिवर्तन करना ही वास्तविक मन-नियंत्रण का आधार है ।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान योग को 'दुष्प्राप' (कठिन) कहते हैं 'असंभव' नहीं, और स्वयं को भोक्ता-स्वामी मानना अविद्या व राग-द्वेष का मूल कारण है, न कि साधन।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि योगभ्रष्ट व्यक्ति ने शुभ कार्य/साधना की है, अतः वह नरक नहीं जाता, और 'छिन्नाभ्र' का अर्थ बिखरा/छिन्न-भिन्न बादल है।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.३७-३९ में अर्जुन प्रश्न पूछते हैं कि जो श्रद्धा से आया किंतु अभ्यास में शिथिल रहने से योग-सिद्धि न पा सका, उसकी क्या गति होती है। वह न नरक का अधिकारी है, न स्वर्ग का, न मोक्ष का। अर्जुन उपमा देते हैं कि जैसे किसी बड़े बादल से टूटा छोटा टुकड़ा (छिन्नाभ्र) किसी दूसरे बादल से न जुड़ पाने पर हवा में बिखरकर समाप्त हो जाता है, क्या ऐसा साधक भी नष्ट हो जाता है? अर्जुन स्वीकार करते हैं कि केवल भगवान श्रीकृष्ण ही उनके इस संशय का अशेष रूप से निवारण कर सकते हैं।
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