भ. गी. 5.23
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥
अनुवाद
जो मनुष्य इसी जीवन में शरीर त्यागने से पूर्व काम और क्रोध से उत्पन्न वेगों को सहन कर पाता है, उसका मन समता में स्थित है और वह सुखी रहता है ।
जो मनुष्य इसी जीवन में शरीर त्यागने से पूर्व काम और क्रोध से उत्पन्न वेगों को सहन कर पाता है, उसका मन समता में स्थित है और वह सुखी रहता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि दोनों स्थितियों में बाह्य क्रिया भले न दिखती हो, परंतु आंतरिक दृष्टिकोण में बड़ा अंतर है। यदि कोई व्यक्ति केवल समाज, कानून या परिस्थिति के डर से रुकता है, तो वह केवल इच्छा को दबा रहा है जिससे मन अशांत रहता है। इसके विपरीत, 'सहन करने' का अर्थ यह विवेक होना है कि काम-क्रोध का वेग आत्म-कल्याण के विपरीत और हानिकारक है, इसलिए उस पर क्रिया नहीं की जाती।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि दबाने का अर्थ केवल अनुष्ठान करना नहीं है, और न ही सहन करने का अर्थ दूसरों पर क्रोध प्रकट करना है, बल्कि विवेक द्वारा उस वेग को रोकना है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि संस्कृत साहित्य में उद्यान/बगीचे को 'आराम' कहते हैं जहाँ मनुष्य प्रसन्नाता व ताजगी का अनुभव करता है। सिद्ध योगी बाहर भटकने के बजाय अपनी आत्मा में ही उस आंतरिक बगीचे (अन्तराराम) का आनंद लेता है। इसके साथ ही, 'अन्तर्ज्योति' वह आंतरिक ज्ञान-प्रकाश है जिससे व्यक्ति जान लेता है कि समस्त मानसिक विकार (काम, क्रोध, सुख, दुख) आत्मा के स्वरूप में नहीं बल्कि प्रकृति/मन के पटल पर हैं, अतः वह उनसे असंपृक्त हो जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'आराम' का तात्पर्य सोए रहना नहीं बल्कि आंतरिक बगीचे/प्रसन्नता में स्थित होना है, और 'अन्तर्ज्योति' का संबंध बाह्य दीपक से नहीं बल्कि आत्म-अनात्म विवेक से है।
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