भ. गी. 4.31ख
अनुवाद
कुरुश्रेष्ठ, जो यज्ञ नहीं करता है वह तो इस तुच्छ सुखों वाले मनुष्यलोक को भी प्राप्त नहीं कर सकता है फिर स्वर्गीय सुख वाले अन्य लोक की तो बात ही क्या है ।
कुरुश्रेष्ठ, जो यज्ञ नहीं करता है वह तो इस तुच्छ सुखों वाले मनुष्यलोक को भी प्राप्त नहीं कर सकता है फिर स्वर्गीय सुख वाले अन्य लोक की तो बात ही क्या है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि कार पेट्रोल से बनी नहीं होती और न ही क्रोध के समय श्वास स्वाभाविक रूप से गहरी चलती है, बल्कि वह उथली और तेज चलती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि कार पेट्रोल या डीजल से केवल चलती है, उससे बनी नहीं होती; परंतु हमारा शरीर भोजन से चलता भी है और भोजन से ही बना है, इसीलिए इसे अन्नमय शरीर कहते हैं। इसके अलावा, भावनाओं का श्वास से सीधा संबंध है—क्रोध या अशांति में श्वास तेज व उथली चलती है, जबकि गहरी श्वास लेने से मन के विकार और काम-वासना शांत होती है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि देखे गए दृश्यों के संस्कारों की उल्टी करके उन्हें तुरंत बाहर नहीं निकाला जा सकता और न ही यज्ञ-हीन व्यक्ति इस लोक में वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि गलत भोजन को शरीर उल्टी या दस्त द्वारा बाहर फेंक सकता है, परंतु आँख और कान से ग्रहण किए गए दूषित आहार की उल्टी संभव नहीं है; वे 'आम' (अधपके भोजन के विष) की तरह भीतर बैठकर मन को रोगी बना देते हैं। श्लोक ४.३१ के अनुसार यज्ञ-हीन व्यक्ति न इस लोक में सुखी रहता है और न ही परलोक में।
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