भ. गी. 4.17
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥
अनुवाद
मनुष्य को निर्धारित कर्म, निषिद्ध कर्म और अकर्म के सत्य का बोध होना चाहिए क्योंकि कर्म की आन्तरिक प्रक्रिया को समझ पाना कठिन है ।
मनुष्य को निर्धारित कर्म, निषिद्ध कर्म और अकर्म के सत्य का बोध होना चाहिए क्योंकि कर्म की आन्तरिक प्रक्रिया को समझ पाना कठिन है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान के अनुसार शांत बैठना भी अकर्म नहीं बल्कि कर्म का रूप हो सकता है, और पशु-पक्षी अपने स्वभाव के अधीन रहते हैं, न कि मनुष्य से अधिक बुद्धिमान होकर धार्मिक कार्य करते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि केवल शरीर की हलचल ही कर्म नहीं होती, बल्कि उसके पीछे का आंतरिक भाव और कर्तृत्व-अभिमान ही कर्म की संज्ञा तय करता है। इसके साथ ही, मनुष्य बुद्धिमान होने के कारण अपने स्वभाव के विरुद्ध भी आदतें बना सकता है, इसलिए मनुष्य पर कर्म का नियम लागू होता है; जबकि पशु केवल अपने स्वभाव-वश प्रारब्ध भोगते हैं और नया कर्म नहीं बनाते।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि जब विहित और निषिद्ध कर्म में तनाव उत्पन्न होता है, तब केवल लकीर का फ़कीर बनकर सत्य बोलना वास्तव में अधर्म (दुर्योधन जैसे अधार्मिक पक्ष) को बढ़ावा दे सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को यही सूक्ष्मता समझाई कि धर्म की अंतिम विजय के लिए बाह्य नियम के बजाय परम कल्याणकारी उद्देश्य को देखना ही कर्म की वास्तविक गहनता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में कर्म त्यागने की बात नहीं कही गई है, और न ही भगवान श्रीकृष्ण का उद्देश्य केवल राज्य भोगना था, बल्कि धर्म की वास्तविक स्थापना करना था।
✓ आपकी प्रोफ़ाइल में सहेजा गया। अपनी प्रगति और बैज देखें
अपनी प्रगति सहेजने और बैज पाने के लिए साइन इन करें। Sign In
ये पहले पूछे गए प्रश्न शायद आपके प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं:
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।