भ. गी. 4.12
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
अनुवाद
अपने कर्मों के फल चाहने वाले मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोक में कर्म से उत्पन्न होने वाली सफलता शीघ्र मिलती है ।
अपने कर्मों के फल चाहने वाले मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोक में कर्म से उत्पन्न होने वाली सफलता शीघ्र मिलती है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि मनुष्य लोक में कर्म से उत्पन्न सफलता शीघ्र मिलती है। देवताओं की पूजा दुकानदार की तरह है जो माँगने पर वस्तु (चाहे वह विष ही क्यों न हो) दे देता है। इसके विपरीत, भगवान पिता और उत्तम वैद्य की भाँति जीव के वास्तविक हित को देखते हैं; यदि कोई वस्तु जीव के लिए हानिकारक हो, तो वे उसका हरण कर लेते हैं या उसे पूरा नहीं करते।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि कोई भी देवता स्वतंत्र रूप से समर्थ नहीं है, सब शक्ति भगवान से ही आती है। भगवान सर्वभूतों के सुहृद हैं और केवल संन्यासियों के लिए ही नहीं बल्कि सभी जीवों के कल्याणकारी हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता सांख्य सिद्धांत के आधार पर बताते हैं कि तीन गुणों के मिश्रण में जब एक मुख्य और दूसरा सहायक होता है, तो परस्पर विरोधी गुण (सत्व और तमस) एक-दूसरे का सहायक नहीं बन सकते, इसलिए गणितीय रूप से केवल चार ही वर्ण/संयोजन संभव हैं। दीपक के दृष्टांत में ज्वाला (सत्व), बत्ती (रजस) और तेल (तमस) एक-दूसरे के विरोधी होते हुए भी मिलकर दीपक को जलाते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि वर्णाश्रम बाह्य कपड़ों या धन से नहीं बल्कि जन्मजात गुणों और स्वभाव पर आधारित है; और तमस गुण दीपक के तेल की भाँति स्थिरता का आधार बनता है, केवल विनाशक नहीं।
✓ आपकी प्रोफ़ाइल में सहेजा गया। अपनी प्रगति और बैज देखें
अपनी प्रगति सहेजने और बैज पाने के लिए साइन इन करें। Sign In
ये पहले पूछे गए प्रश्न शायद आपके प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं:
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।