भ. गी. 2.64
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
अनुवाद
परन्तु आत्मसंयमी व्यक्ति की इन्द्रियाँ उसके वश में होती हैं । अतएव वह राग और द्वेश से मुक्त होता है। अपनी इन्द्रियों से इन्द्रियविषयों का अनुभव करते हुए भी वह मन की शान्ति प्राप्त करता है ।
परन्तु आत्मसंयमी व्यक्ति की इन्द्रियाँ उसके वश में होती हैं । अतएव वह राग और द्वेश से मुक्त होता है। अपनी इन्द्रियों से इन्द्रियविषयों का अनुभव करते हुए भी वह मन की शान्ति प्राप्त करता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार 'विधेयात्मा' वह है जिसका मन और इंद्रियाँ उसकी आज्ञा के अनुसार चलती हैं। जब ऐसा साधक राग और द्वेष से रहित होकर विषयों में विचरता है, तो उसे 'प्रसाद' मिलता है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि 'प्रसाद' शब्द के तीन गहरा अर्थ हैं—प्रसन्नता, मन की निर्मलता (मल-रहितता) और भगवान की अहैतुकी कृपा।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि धन और पद मिलने से मन की प्रसन्नता नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त प्रसाद का तात्पर्य केवल भौतिक खाद्य पदार्थ तक सीमित नहीं है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार प्रसाद मिलने का अर्थ बाह्य स्थितियों का अचानक बदल जाना नहीं है, बल्कि मन का उन स्थितियों से अप्रभावित और शांत रहना है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि बाह्य परिस्थितियाँ चाहे जो हों, दुःख की अंतिम अनुभूति हमारे मन में ही होती है। जब मन निर्मल और शांत (प्रसन्न-चित्त) हो जाता है, तो दुःख प्रभावहीन हो जाते हैं और बुद्धि स्थिर हो जाती है। भागवत के रूपक में दक्ष की पुत्री 'शांति' है और शांति का पुत्र 'सुख' है—अर्थात् वास्तविक कार्य-कुशलता (दक्षता) शांति पैदा करती है और शांति से ही सुख की उत्पत्ति होती है।
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