भ. गी. 2.30
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
अनुवाद
हे भरतवंशी ! समस्त प्राणियों के देह में वास करने वाला देही (आत्मा) नित्य अविनाशी है, अतः तुम्हें किसी के लिए शोक नहीं करना चाहिए ।
हे भरतवंशी ! समस्त प्राणियों के देह में वास करने वाला देही (आत्मा) नित्य अविनाशी है, अतः तुम्हें किसी के लिए शोक नहीं करना चाहिए ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार किसी विशेष उद्देश्य से बात को दोहराना 'पुनरुक्ति दोष' नहीं बल्कि 'अनुवाद' कहलाता है। इसके अलावा, शोक भविष्य की चिंताओं से नहीं बल्कि मुख्य रूप से अतीत (भूतकाल) की घटनाओं में अटके रहने से होता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि वक्ता के गूढ़ तात्पर्य को जानने के लिए पूर्व मीमांसा में छः लिंग (अभ्यास, अपूर्वता आदि) बताए गए हैं, जिनमें से एक 'अभ्यास' (बार-बार कहना) है। भगवान अर्जुन को अज्ञान से बाहर निकालने के लिए इसका अनुवाद करते हैं। साथ ही, मन का भूतकाल (अतीत) में अटका रहना शोक पैदा करता है और भविष्य की चिंता भय उत्पन्न करती है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार स्वधर्म व्यक्तिगत भोग का नाम नहीं है, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव और सामाजिक दायित्व के अनुकूल कर्तव्य है। इसके अलावा, युधिष्ठिर महाराज राज्य केवल धर्म-स्थापना के लिए चाहते थे, विषय-भोग या प्रतिशोध के लिए नहीं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि श्लोक ११ से ३० तक भगवान ने आत्मा और शरीर का विवेक समझाया। इसके पश्चात् वे शरीर और समाज के व्यावहारिक स्तर पर 'स्वधर्म' की बात करते हैं। पांडवों ने युद्ध से पूर्व शांति व संधि के सभी सम्भव प्रयास किए थे, इसलिए यह युद्ध विषय-भोग के लिए नहीं बल्कि धर्म-पालन और प्रजा-रक्षा हेतु 'धर्मयुद्ध' है।
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