भ. गी. 2.27
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
अनुवाद
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरता है उसका जन्म निश्चित है । अतः तुम जिसे रोक नहीं सकते उसपर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ।
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरता है उसका जन्म निश्चित है । अतः तुम जिसे रोक नहीं सकते उसपर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि भगवान यहाँ किसी सामाजिक दबाव या अंधी धारणा का प्रयोग नहीं कर रहे, बल्कि विरोधी सिद्धांतों को भी तर्क की कसौटी पर कस रहे हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि दर्शन शास्त्र में इसे 'अभ्युपगम वाद' कहते हैं। यदि कोई देहात्मवादी या अनित्यवादी पक्ष भी मान ले कि शरीर के साथ ही नित्य जन्म और मरण होता है, तो भी चूँकि उत्पत्ति वाली वस्तु का विनाश निश्चित (अपरिहार्य) है, इसलिए उस पर शोक करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं बचता।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार प्रकृति का नियम निरंतर परिवर्तन का है। भौतिक तत्व कभी नष्ट होकर शून्य नहीं होते, बल्कि एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होते रहते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि यदि देहात्मवादी दृष्टिकोण से भी देखें, तो शरीर पंचभूतों का संघात है। मृत्यु के बाद ये तत्व वापस मिट्टी/प्रकृति में मिलकर पौधों, अन्नादि के माध्यम से पुनः नए शरीरों की उत्पत्ति का कारण बनते हैं; अतः मृत्यु में ही नए रूप का जन्म निहित है।
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If someone's mother or a very near one dies, which is inevitable. And one cries. Thats natural human emotion.
Does this sloka says we shouldn't even cry in such cases, won't that make a person hard hearted and non compassionate for one's or anyone's else grief.