भ. गी. 14.5
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
अनुवाद
हे महाबाहो! भौतिक प्रकृति से उत्पन्न* गुण, अर्थात् सत्त्व, रजस् और तमस्, अविनाशी देहधारी जीव को शरीर से बाँधते हैं।
टिप्पणियाँ
* यहाँ तीनों गुणों को भौतिक प्रकृति से उत्पन्न बताया गया है, किन्तु अन्य स्थानों पर, जैसे श्रीमद्भागवत पुराण में, उन्हें भौतिक प्रकृति के घटक कहा गया है। इन दोनों वर्णनों में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि ये गुणों की दो भिन्न अवस्थाओं से सम्बन्धित हैं। अव्यक्त अवस्था में गुण साम्यावस्था में रहते हैं, और इसलिए कोई विकास नहीं होता। इस मूल अवस्था में भी गुणों का अस्तित्व स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे प्रकृति के घटक हैं। जिस असन्तुलित अवस्था में गुण सक्रिय होते हैं, उसी को केवल ‘जन्म लेना’ कहा गया है, क्योंकि गुणों के कार्य इसी अवस्था में दिखाई देते हैं।