भ. गी. 13.0
अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
अनुवाद
अर्जुन ने पूछा: हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय के विषय में जानना चाहता हूँ।
टिप्पणियाँ
यह श्लोक केवल भगवद् गीता के बंगाली संस्करण में पाया जाता है तथा प्रसिद्ध गीताप्रेस संस्करण में नहीं पाया जाता है । अतः हमने श्लोक संख्या को गीताप्रेस संस्करण के अनुरूप रखने के लिए इसे शून्य के रूप में क्रमाङ्कित किया है ।