भ. गी. 1.44
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥
अनुवाद
हे जनार्दन ! हमने ऐसा पारम्परिक स्रोतों से सुना है कि जिनकी कुल परम्पराएँ नष्ट हो गई हैं वे अनिश्चित काल तक नरक में वास करते हैं ।
हे जनार्दन ! हमने ऐसा पारम्परिक स्रोतों से सुना है कि जिनकी कुल परम्पराएँ नष्ट हो गई हैं वे अनिश्चित काल तक नरक में वास करते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि जब अर्जुन का मन मोहग्रस्त हुआ, तो उसका तर्क भी बदल गया; क्योंकि हमारी बुद्धि जो कार्य करना चाहती है उसके पक्ष में कोई न कोई तर्क ढूंढ ही लेती है। साथ ही, भक्ति मार्ग में अहंकार को छोड़ने या नष्ट करने की बात नहीं की जाती, क्योंकि शरीर और मन के संचालन हेतु अहंकार आवश्यक है; बल्कि अहंकार का रुख बदलकर स्वयं को ईश्वर का दास स्वीकार करना ही वास्तविक समाधान है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार बुद्धि मन की इच्छाओं व मोह के अनुरूप अपने तर्क बदलती है, निष्पक्ष नहीं रहती। इसके अलावा, अहंकार या बुद्धि को पूरी तरह त्यागना या शून्य करना संभव नहीं है, क्योंकि शून्य करने के प्रयास में भी एक अहंकार कार्य कर रहा होता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि लोभ 'काम' से उत्पन्न होता है और नरक (दुःख) का द्वार है। अज्ञानी मनुष्य धर्म का आचरण किए बिना सुख (पुण्य का फल) चाहता है और अत्यंत प्रयास करके अधर्म का बीज बोता है, जबकि अधर्म से केवल दुःख रूपी काँटे ही प्राप्त हो सकते हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि राज्यसुख का लोभ व्यक्ति को स्वजनों की हत्या और पाप कर्मों के लिए उद्यत करता है; यह पुण्य या शांति की ओर नहीं बल्कि अशांति और भयंकर दुःख की ओर ले जाता है।
✓ आपकी प्रोफ़ाइल में सहेजा गया। अपनी प्रगति और बैज देखें
अपनी प्रगति सहेजने और बैज पाने के लिए साइन इन करें। Sign In
ये पहले पूछे गए प्रश्न शायद आपके प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं:
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।