भ. गी. 1.35
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
अनुवाद
हे मधुसूदन ! यदि मैं उनके द्वारा मारा भी जाऊँ, तो भी मैं तीनों लोकों पर प्रभुत्व के लिए भी उन्हें मारना नहीं चाहता। पृथ्वी पर प्रभुत्व तो दूर की बात है।
हे मधुसूदन ! यदि मैं उनके द्वारा मारा भी जाऊँ, तो भी मैं तीनों लोकों पर प्रभुत्व के लिए भी उन्हें मारना नहीं चाहता। पृथ्वी पर प्रभुत्व तो दूर की बात है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'मधु' का अर्थ धन का लोभ और 'कैटभ' का अर्थ कायरता नहीं है, बल्कि ये दोनों हमारी स्वयं की प्रशंसा सुनने और दूसरों की निंदा सुनने की आंतरिक मानसिक प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि कान के दो मैल ही 'मधु' और 'कैटभ' असुर हैं। अपनी प्रशंसा सुनना मधु (शहद) की तरह मीठा लगता है और दूसरों की निंदा सुनना या उन्हें नीचा दिखाना कैटभ की भाँति अहंकार को पुष्ट करता है। इन दोनों मनोविकारों (असुरों) का विनाश केवल भगवान मधुसूदन ही कर सकते हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि यद्यपि अर्थशास्त्र के अनुसार आततायी का वध करने में पाप नहीं लगता, फिर भी अर्जुन धर्मशास्त्र का तर्क देकर युद्ध से हटना चाहता है। वह ऐसा अपने पारिवारिक संबंधों से निर्मित अपने अहंकार को बचाने और समाज में होने वाले पश्चाताप व अपमान से बचने के लिए कर रहा है, जो कि एक सशर्त (उपाधिक) वैराग्य है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन शास्त्रों से अनभिज्ञ नहीं था और न ही वह कौरवों को संत मानता था; वह स्वयं कौरवों को 'आतताई' कहकर स्वीकार करता है, फिर भी अपने अहंकार की रक्षा हेतु ऐसे तर्क गढ़ता है।
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