भ. गी. 1.20-21क

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।

अनुवाद

हे सम्राट ! तब आपके पुत्रों और समर्थकों को युद्ध के लिए तैयार देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुन, जिनके ध्वज पर हनुमान का चिह्न है, ने तीर चलाने की तैयारी करते हुए अपना धनुष उठाया और उस समय इन शब्दों में श्री कृष्ण को सम्बोधित किया ।

टिप्पणियाँ

इन निम्नलिखित तीन पङ्क्तियों में से तीसरी पङ्क्ति (सेनयोरुभयो ...) परवर्ती श्लोक की पहली पङ्क्ति में सम्मिलित कर श्लोक संख्या २१ बनती है । अनुष्टुप छन्द के ३२ अक्षर (८ अक्षर की एक पङ्क्ति से) से कुल चार पङ्क्तियां बनती हैं । तदुपरान्त पङ्क्ति निम्नलिखित श्लोक में गीनी जाती है । जैसे कि यहाँ श्लोक २० की तीन पङ्क्तिय़ों में से तीसरी पङ्क्ति को श्लोक २१ में सम्मिलित किया गया है । यही बात अन्य उदाहरणों में भी समझ लेनी चाहिए जहाँ श्लोक को विभाजित किया गया है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, शंखनाद की भयानक ध्वनि ने केवल धृतराष्ट्र के पुत्रों और उनकी सेना के हृदय को ही 'विदीर्ण' (भयभीत) क्यों किया, जबकि पांडवों की सेना पर ऐसा कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा?

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